प्रति
Karan
Chandigarh · 2012
दोस्तीसार्वजनिक ख़त
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Chandigarh · 2012
दोस्तीसार्वजनिक ख़त
एक सार्वजनिक ख़त। इसके लिखने वाले ने इसे सबके पढ़ने के लिए खुला छोड़ा।
स्कूल की आख़िरी घंटी के बाद हम रोज़ झील के किनारे बैठते थे और गिनते थे कि आज कितनी बत्तखें आईं।
करन, तुम कहते थे कि दोस्ती दूरी से नहीं, चुप्पी से टूटती है।