प्रति
प्रिया
जयपुर · 2018
स्टेशन की वो बेंच, जिस रात बारिश हुई और तुम मेरी टूटी छतरी पर हँसती रहीं।
मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि उस रात मेरी आँखें सिर्फ़ बारिश से नहीं भीगी थीं।
इस ख़त का बाक़ी हिस्सा मुहरबंद है।
Ayesha, Aisha, عائشہ, आयशा: हर वर्तनी और हर लिपि में वही ख़त मिलते हैं।
हर ख़त पर लिखने वाले के एक सवाल का ताला है। आपके पास तीन मौक़े हैं।
अगर ख़त आपके लिए ही था, तो वह खुल जाएगा, और लिखने वाले को आख़िरकार पता चलेगा कि वह पहुँच गया।
कोई अकाउंट नहीं। सिर्फ़ पहले नाम। हर ख़त दिखने से पहले एक इंसान पढ़ता है।
एक मुहरबंद ख़त
प्रति
जयपुर · 2018
स्टेशन की वो बेंच, जिस रात बारिश हुई और तुम मेरी टूटी छतरी पर हँसती रहीं।
मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि उस रात मेरी आँखें सिर्फ़ बारिश से नहीं भीगी थीं।
इस ख़त का बाक़ी हिस्सा मुहरबंद है।
मुहरबंद। यह ऐसे सवाल से खुलता है जिसका जवाब सिर्फ़ सही इंसान जानता है।